बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

हिंदी के ‘हिंग्लिशीकरण’ बनाम ‘क्रिओलीकरण’ की होली

दुनिया भर में, ‘विश्व के सबसे बड़े जनतंत्र’ की तरह ख्यात भारत ने जब एक नव-स्वतंत्र राष्ट्र की तरह विश्व-राजनीति में जन्म लिया, तब निश्चय ही न केवल ‘पराजित’ बल्कि, लगभग हकाल कर बाहर कर दी गई औपनिवेशिक-सत्ता के कर्णधारों की आंखें इसकी ‘असफलता’ को देखने के लिए बहुत आतुर थीं। चर्चिल की बौखलाहटों को व्यक्त करती हुईं, तब की कई उक्तियां इतिहास के सफों पर आज भी दर्ज हैं। अलबत्ता, उनकी ‘अपशगुनी उम्मीदों’ के बर-खिलाफ, जब-जब इस ‘महादेश’ में संसदीय चुनाव हुए, तब-तब इस बात की पुष्टि काफी दृढ़ता के साथ हुई कि बावजूद सदियों की पराधीनता के, भारतीय-जनमानस में एक अदम्य लोकतांत्रिक-आस्था है, जो केवल उसके सोच भर में स्पंदित नहीं है, बल्कि उसकी तमाम संस्थाओं में लगभग दहाड़ती हुई उपस्थित है। कहने की जरूरत नहीं कि उसके चौथे खंभे में तो नृसिंह की-सी शक्ति है, जो सत्ता के पेट को चीर सकती है।

बहरहाल, इंदौर नगर में पिछले दिनों गांधी-प्रतिमा स्थल पर कतिपय बुद्धिजीवियों ने देश भर के कोई बीस-बाइस हिंदी समाचारपत्रों की एक-एक प्रति जुटाकर, तमाम अखबारों के द्वारा अकारण ही तेजी से किए जा रहे हिंदी के हिंग्लिशीकरण बनाम ‘क्रिओलीकरण’ के खिलाफ उनकी होली जलाई। निश्चय ही प्रतिकार की इस प्रतीकात्मकता से जो लोग असहमत थे, वे इसमें शामिल नहीं हुए। उनके पास अपने तर्क और अपनी स्पष्ट मान्यताएं थीं, जबकि अखबारों की ‘होली’ जलाने वालों के पास अपनी सिद्धान्तिकी थी। दोनों के पक्ष-विपक्ष में एक गंभीर विमर्श भी बन सकता था। बहरहाल, घटना छोटी-सी और निर्विघ्न सी थी, लेकिन भारतीय पत्रकारिता के तिरेसठ साल के इतिहास में पहली बार घट रही थी। किसी हिंदी अखबार ने यह खबर प्रकाशित नहीं की।

प्रश्न उठता है कि जो समाचारपत्र वर्ष के तीन सौ पैंसठ दिन ‘समय और समाज’ की खाल खींच कर उसमें नैतिकता का नमक डालने पर तत्पर रहता है, क्या वह तिरेसठ वर्ष के अपने जीवनकाल में मात्र एक दिन किसी एक शहर में अपने पाठक की असहमति और उसका प्रतीकात्मक प्रदर्शन तक बरदाश्त नहीं कर सकता? नेहरू के विषय में कहा जाता रहा है कि उनका अहम् काफी अदम्य था और वे अमूमन अपनी असहमति या अवमानना पर तिक्त हो जाते थे।

एक प्रसंग मुझे याद आ रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया के तब के ख्यात संपादक मुलगांवकर प्रधानमंत्री आवास पर स्वल्पाहार हेतु आमंत्रित थे और जिस सुबह वे आमंत्रित थे, ठीक उसी दिन उन्होंने नेहरू तथा नेहरू-सरकार के विरुद्ध अपने अखबार में बहुत तीखी संपादकीय टिप्पणी छाप दी। लगभग आठ बजे प्रधानमंत्री-आवास से दूरभाष पर सूचना दी गई कि किन्हीं अपरिहार्य कारणों से पूर्व में स्वल्पाहार के समय प्रधानमंत्री के साथ निर्धारित भेंट निरस्त की जा रही है।

यह सूचना पाते ही मुलगांवकर ने नेहरू को फोन किया कि ठीक है कि आज का संपादकीय आपके तथा आपकी सरकार के खिलाफ है, लेकिन इसका हमारे नाश्ते से क्या लेना-देना है? नेहरू ऐसे थे कि सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर रहते हुए भी ठिठक कर बुद्धिजीवियों द्वारा की गई अपनी आलोचना सुन सकते थे। कदाचित उनके इसी जनतांत्रिक धैर्य को ध्यान में रखकर दुनिया भर की प्रेस उन्हें ‘डेमोक्रेटिक प्रॉफेट’ के विशेषण से संबोधित भी करती थी।

बहरहाल, इस कार्यवाही को लेकर इतना आहत और क्रोधित नहीं होना चाहिए कि अखबारों द्वारा अकारण किए जा रहे क्रिओलीकरण के खिलाफ शुद्ध गांधीवादी प्रतिकार की खबर को वे अपने पृष्ठों पर तिल भर भी जगह न दें। यह काम निश्चय ही संपादक का नहीं हो सकता। तो क्या हमारे समाचारपत्रों में एक किस्म की ‘कॉरपोरेट सेंसरशिप’ अघोषित रूप से आरंभ है? जबकि, ठीक उसी दिन दैनिक भास्कर ने क्रिओलीकरण के विरुद्ध लिखी गई मेरी तीखी टिप्पणी ससम्मान और प्रमुखता से छापी। राजनीतिक सत्ताएं तो विचार को खतरा मानती हैं और उससे डरती भी हैं, लेकिन अखबार की ताकत तो विचार ही है। विचार तो उसके लगभग प्राण हैं? फिर चाहे वे सहमति के रूप में हों, या असहमति के रूप में।

आज हमारा समाज जितना सूचना-संपन्न हुआ है, उसके पीछे प्रमुख रूप से लिखे-छपे शब्द की बहुत बड़ी भूमिका है। यदि पाठकों का एक छोटा-समूह संवादपरक प्रतिरोध की संभावना के पूरी तरह निशेष हो जाने के बाद निहायत ही गांधीवादी तरीके से अपना विरोध होली जलाकर प्रकट कर रहा है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि समाचारपत्रों में हो रही आई उसकी आस्था का पूर्णत: लोप हो गया है। गांधीजी ने जब विदेशी वस्त्रों की होली जलाई थी, तो वे वस्त्रोत्पादन के विरुद्ध कतई नहीं थे।

मुझे ब्रिटिश प्रधानमंत्री चेम्बरलेन द्वारा ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में दिए गए भाषण की याद आती है। उन्होंने कहा था, ‘ऑक्सफर्ड ने हमें जब-जब जैसा-जैसा करने को कहा, हमने हमेशा ही ठीक वैसा-वैसा किया, लेकिन जब ऑक्सफर्ड को हमने अपने जैसा करने को कहा, उसने वैसा कभी नहीं किया और एक ब्रिटिशर की तरह मुझे इन दोनों बातों पर अपार गर्व है।’

चेम्बरलेन ने यही कहना चाहा कि हम ब्रिटिशर्स विचार के स्तर पर इतने उदार हैं कि अपनी प्रखरतम आलोचना का सम्मान करते हैं, लेकिन उन्हें अपने मुल्क की बुद्धिजीवी बिरादरी पर भी गर्व है जो असहमतियों को व्यक्त करने में भीरू नहीं है। किसी भी देश और समाज में भीरुता का वर्चस्व बौद्धिकों में व्याप्त होने लगे, तब शायद यह मान लेना चाहिए कि वे फिर से पराधीन होने के लिए तैयार हैं।

‘कल्चरल इकोनॉमी’ उनकी अर्थव्यवस्था का तीसरा घटक है। क्या हमें यह नहीं दिखाई दे रहा कि अमेरिका और ब्रिटेन ‘ज्ञान समाज’ के नाम पर मात्र अपने सांस्कृतिक उद्योग की जड़ें गहरी करने में लगे हैं? हिंदी, यदि संसार की दूसरी सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा की चुनौतीपूर्ण सीमा लांघने को है, तब उसे एक धीमी मौत मारने के लिए उसका क्रिओलीकरण क्यों किया जा रहा है? अभी षडयंत्र की यह पहली अवस्था है, ‘स्मूथ डिस्लोकेशन ऑव वक्युब्लरि’।

यदि अखबारों की होली जलाकर प्रकट किए गए इस विरोध के बाद हिंदी के समाचार पत्रों मंे भाषा के ‘क्रिओलीकरण‘ की गति तेज हो जाए तो यह स्पष्ट सूचना जाएगी कि भाषा संबंधी नीतियों के पीछे अंग्रेजी की ‘नवसाम्राज्यवादी’ शक्तियां दृढ़ता के साथ काम कर रही हैं।

यदि पाठकों का एक छोटा-समूह ‘संवादपरक प्रतिरोध’ की संभावना के पूरी तरह निशेष हो जाने के बाद, निहायत ही गांधीवादी तरीके से अपना विरोध होली जलाकर प्रकट कर रहा है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि समाचारपत्रों में हो रही आई उसकी आस्था का पूर्णत: लोप हो गया है।

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